धर्म_और_धृष्टता

            वाकई एक दोषी की सजा या रिहाई का निर्णय उसकी दुष्टता के आधार पर ही होता है और अपने देश में तो ये तय है ही कि दोषी या पीड़ित का कोई न कोई धर्म या जाति भी होगी। हालांकि जाति-धर्म की तुस्टीकरण को नियंत्रित करने के लिए संविधान लागू है, फिर भी सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सबकी भी कुछ जिम्मेदारी हैं कि नहीं। यहां एक सवाल सबके जहन में आया होगा कि

"संविधान लागू होने से पहले क्या जाति-/धर्म के आधार पर सबके अन्याय ही होता होगा, तब तो जाति प्रथा और भी ज्यादा हावी थी-???

जी नहीं,
जब कोई अपना कुछ घिनौना कर बैठता है ना तो सबसे ज्यादा शर्म/ग्लानि सगे रिश्तों को ही होती है, सबसे ज्यादा गुस्सा अपनो को ही आता है। गांव के बच्चे तो कभी दूसरों के परिजन से थप्पड़ नहीं खाते बल्कि उलाहनों पर हमेशा अपने माँ बाप से ही कूटते हैं वो भी या तो सारे डंडे ही टूट जाते या उलाहना देने वाले छुड़ाते हैं कि अब मार ही डालोगे क्या-??

मेरे लिए तो अभी भी वो दिन नहीं गुजरे हैं ,बस वयस्क हो गए हैं इसिपर कुछ भी समझ लो । वरना पिटवाने वाले से तो अक्सर शाम को ही खान-पान शुरू हो जाता था मगर अपने बाबा/पापा से महीनों बोल चाल बंद रहती है।

हमारे गांव में दुश्मनी के कारण सदियों से बंद पड़े बोल-चाल ,खान-पान को फिर से शुरू करने के लिए दुश्मनों के घर में आग या अनहोनी पर मदद करके फिर से व्यवहार शुरू करना ही एकमात्र बहु प्रतीक्षित मौका होता था।

मगर बड़ा अफ़सोस होता है कि अब वो दिन भी देखने पड़ रहे हैं जबकि बेहद असहनीय, बेहद नाजुक परिस्थिति पर भी मदद के लिए हमें अपनी जाति/धर्म का सहारा लेना होगा। उस पर मदद करने वाले भी मुँह खोलने तक के लिए अपनी जाति या धर्म का मिलान करेंगे, न्याय के लिए जाति/धर्म के अनुसार चुप्पी साधकर दोषी का बचाव या आक्रोश दिखाएंगे । न्याय-अन्याय पर खुलने के बजाए अपनी नजदीकी (जाति-धर्म) का दुराव पर बहस करेंगे..........मेरे धर्म से न जोड़ो, मेरी जाति का है तो क्या हुआ मैं तो नहीं हूं ऐसा

भाई जान मैंने मान लिया यदि दोषियों का कोई धर्म नहीं होता
तो पहला थप्पड़ आपका क्यों नहीं.........???

तो विरोध करने ,अफ़सोस करने या न्याय मांगने वालों के सभी चेहरे एक ही होते, पीड़ितों या दोषियों के चेहरों की तरह बदलते क्यों हैं.........???

उस पर आम लोग तो छोड़िए सरकारें तक किसी के दरवाजों पर लोटती है तो किसी के लिए मुँह भी बहुत साध के खोलती हैं, क्यों- ???

आज अपनी बेटियां अवाक हैं कि वो यदि न्याय की उम्मीद भी करें तो किससे.......
#समाज से...???
नहीं, उन्ही में तो खुले भेड़िए घूम रहे हैं।

#पड़ोसी से...???
नहीं, वो कब टॉफी देते देते चिथड़े उड़ा दें पता नहीं।

#चाचा, #मामा, #भाई या कि #पिता...???
नहीं, उनमें भी कौन जंगली सुअर हैं क्या पता।

#कानून से...???
नहीं, उनकी बलात्कार, हत्या पता नहीं कब, किस परिभाषा से बाहर हो जाओ।

#सरकार...???
नहीं, वो तो धर्म जाती देखकर आपके दरवाजे जाना है कि नहीं ये तय करने में मशगूल हैं।।।

😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢😢
Adarsh Dwivedi

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